ज्वालामुखी क्यों ब्लास्ट होती है 


 ज्वालामुखी का विस्फोट होने के कई कारण माने गए हैंविस्फोट को ज्वालामुखी उद्भेदन कहा जाता है। ज्वालामुखी उद्भेदन का पहले से आभास हो जाता है। शुरू में गड़गड़ाहट सुनाई देती है फिर भूकम्प के धक्के लगते हैं। ये दोनों लक्षण ज्वालामुखी की चेतावनी देते हैं। उद्गार से पूर्व समीप की भूमि का ताप बढ़ जाता है व भूमि नीचे की ओर धँस जाती है। उद्भेदन के बाद कंपन बन्द हो जाते हैं।

उद्भेदन का पहला लक्षण गड़गड़ाहट है एवं दूसरा यह कि कुओं आदि के स्रोत रुक जाते हैं। समुद्रों का जल ऊपर नीचे होने लगता है। कभी बिना पूर्व सूचना के भी ज्वालामुखी यकायक फूट पड़ता है। विस्फोट के समय मुख से गैसें, लावा आदि बाहर आते हैं। ऊँचाई पर जाकर ये बादल के रूप में बदल जाते हैं और भारी वर्षा होती है। वाष्प के निकलने के बाद लावा, राख, चट्टानों के टुकड़े बाहर निकलते हैं। 


ज्वालामुखी विस्फोट के निम्नलिखित कारण हैं

(1) भू-गर्भ में ताप की वृद्धि–सूर्य द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति में विश्वास करने वालों का यह मत है कि पृथ्वी का आन्तरिक ताप सूर्य का ही अवशिष्ट ताप है। कुछ विद्वानों की मान्यता है कि पृथ्वी के भीतर रेडियोधर्मी पदार्थ पाये जाते हैं। इनके विघटन से ताप उत्पन्न होता है। कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार भूगर्भिक हलचलों एवं रासायनिक प्रतिक्रियाओं के कारण ताप उत्पन्न होता है। किन्तु थार्नबरी के अनुसार यह सम्भव है कि उपर्युक्त अवस्थाओं में से एक से अधिक अवस्थाओं में सम्मिलित प्रभाव के फलस्वरूप ही पृथ्वी के भीतर ऊँचा तापमान पाया जाता है। तापमान में अत्यधिक वृद्धि हो जाने से शैलें द्रव अवस्था में आ जाती हैं। यह द्रव कमजोर दरारों से होकर ज्वालामुखी के रूप में धरातल तक पहुँचने का प्रयास करता है।


 ( 2 ) गैसों की उत्पत्ति-ज्वालामुखी उद्भेदन में गैसें ही मुख्य नोदक शक्ति के रूप में कार्य करती हैं। इन ज्वालामुखी गैसों में 80 से 95 प्रतिशत भाग जलवाष्प का होता है। हाइड्रोजन, सल्फर एवं कार्बन अन्य महत्त्वपूर्ण गैसें हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि ये सब गैसें मूल मैग्मा के अवयव हैं। ज्वालामुखी गैसों में जलवाष्प सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। ज्वालामुखी विस्फोट के समय जिस परिमाण में वाष्प बाहर निकलती है उसे देखकर विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि मूल मैग्मा के अतिरिक्त समुद्र जल एवं भूमिगत जल उत्पत्ति के अन्य प्रमुख स्रोत हैं।


( 3 ) ज्वालामुखी उद्गार में लावा का निःसृत होना-ज्वालामुखी ग्रीवा में लावा को ऊपर उठना गैसों की सहायता से होता है। इस दौरान तरल लावा के साथ सदैव गैसों का संयोग रहता है। भू-गर्भ में लावा के साथ मिली ये गैसें अपरिमित दबाव उत्पन्न करती हैं। गैसों के इस प्रचण्ड दबाव से लावा भू-पटल की ओर अग्रसर होता है और जहाँ कहीं भू-पटल पर कमजोर स्थल होता है, वहाँ ये गैसें भूमि को फोड़कर भारी विस्फोट के साथ बाहर निकल पड़ती हैं। लावा की भूमि से बाहर निकलने की क्रिया ठीक उसी प्रकार होती है, जैसे—सोडावाटर की बोतल खोलते ही गैसों के साथ कुछ सोडावाटर भी बाहर निकल पड़ता है।


(4) भूगर्भिक असन्तुलन-भूगर्भिक असन्तुलन के कारण शैलों में गति एवं भूकम्प आदि घटनायें होती हैं जिनसे भूगर्भिक क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों के कारण ज्वालामुखी क्रिया होती है। विश्व के अधिकांश सक्रिय ज्वालामुखी भूगर्भिक दृष्टि से असन्तुलित क्षेत्रों में पाए जाते हैं।


(5) दाब में कमी-ऊपरी परतों के दबाव के कारण भूगर्भ में शैलें उच्च तापमान पर भी ठोस बनी रहती हैं। भूगर्भिक हलचलों के कारण कई बार ऊपरी शैलों का दबाव कम हो जाता है। दबाव कम हो जाने से निचली शैलें पिघल जाती हैं, उसके कारण उसका आयतन बढ़ जाता है तथा मैग्मा ज्वालामुखी क्रिया को प्रोत्साहित करता है।